बुधवार, 1 जनवरी 2014

जनपथ नवंबर 2013 में प्रकाशित कविताएँ 


1-  चुक जाने के बाद 
 
      सब कुछ बेच- खरीद कर 
      चुक जाने के बाद 
      आना लौट कर 
      अपनी कविता के पास 
      किसी भी रस्ते से 
      पर दुकान से होते नहीं  
      पूरी की पूरी तुम्हारी होगी 
      बिना ख़रीदे , बिना बेचे 
      

       आना अपनी कविता के पास 
       अच्छर ग्यान से ही काम चलेगा 
       गणित न आती हो तो भी 


      गढ़ सको, तो गढ़ना  
      रच सको, तो रचना 
      लिख सको, तो लिखना 
      देख सको, तो देखना 
      पढ़ सको, तो पढना  

पूरा का पूरा महसूस कर सकोगे 
अपने आपको 


      सब कुछ बेच- खरीद कर 
      चुक जाने के बाद   
      खोजना अपनी कविता को 
      बंद आखों से काम चलेगा 
      अच्छर चीन्ह न पाओ तब भी 


      देखना, किसी की आँखों में 
      छूना, किसी की घुंघराली लटों में
      सुनना, किसी तोतली बोली में 
      सूँघना, धरती से उठती गंध में 
      चखना, अनजानी रिश्तों के रस में 
      
 
      बिना  ख़रीदे   बिना  बेचे 

      पाओगे    
      
      कि,  कविता तुम्हारी ही है .
      
      सब कुछ बेच- खरीद कर 
      चुक जाने के बाद   

     आना ही है, लौट कर 

    एक न एक ........................
 
    दिन 
   
      कभी न कभी 
      कभी न कभी 



2 -    बेटे जैसा  माना  था ..........


       बेटे जैसा मान कर 
       रखा था घर में 
       पूरी सोसाएटी मानती थी 
       यह बात !
 

        पर 
       बेटे जैसे को 
      अपनी रोटियाँ अलग ही 
      सेकनी थी खुद 
      जल्दी में सिकी रोटियों 
      का साथ , अक्सर 
      अकेली , बासी सब्जी ही 
      निभाती थी .


     चाय भी बामुश्किल दो बार मिलाती  !
     इसके लिए  भी 
     उस बेटे जैसे को 
     बेटे जैसा टाइम बेटाइम 
     जिद कर लेने का हक़ नहीं था   


     बेटे जैसे को 
     मना कर रखा था 
     काम पर रखने से पहले ही 
 
     कि 
     नहीं करोगे दोस्ती 
    घर की बात बाहर चली जाती है 
    इस रस्ते , वैसे 
    बेटे के सारे दोस्त 
    माँ पुकारते है ,मुझे 
    अच्छा लगता है 
    
    और, वह भी तो 
    जमघट लगाये रहता है 
    उसकी पर्सनालिटी यारबाज जो है 

    डांट देने के बाद 
    बहुत मनाना पड़ता है बेटे को 
    मुझे भी उसके मान जाने तक 
   कुछ भी तो अच्छा नहीं लगता 

   माँ!!!!!!!!  जो हूँ ,उसकी 
   
     बेटे  जैसे के साथ 
    सहूलियत  इस बात की है 
    कि  काम से हटा देने की धमकी ही 
     खत्म कर देती है उसके गुस्से को 
         

    हिदायत साफ थी 
    कुत्ते को पार्क घुमाने 
    में टाइम का ध्यान रखने की 
    देर होने पर 
    दिल धडकता कि 
    फँस न जाएँ  बैठे बिठाएं 
    और 

    कुत्ता  भी तो कम सस्ता नहीं है 
 
    आप समझ सकते है 
    कि, इसके बाद भी 
    विश्वास करने की कोई न कोई 
    लकीर तो खीचनी ही पड़ती है 

    क्या पता 
    हमारे विश्वास का फायदा 
    उठा लेने का मौका देख 
    बेटे की बीमारी का बहाना ही हो 
    पाँच हजार रुपये  कम तो होते नहीं 


    हम तो दूसरे को भी  
    बेटे जैसा ही रखेंगे !!!!!!!!





  कवि  ने कल ही खबर पढ़ी 
 परिवार ने जिसे बेटे जैसा पाला था 
 उसी नौकर ने खाने में जहर डाला था  

3- समझदार लोग

समझदार लोग
साध लेते है
छल,छंद,औ’ दम्भ

समझदार लोग जब बोलते है ‘हम’ की भाषा तो
प्रभावी ढ़ंग से उभरता है उनका ‘मैं’
यह उनकी भाषा
‘साधने’ की कला है ।

समझदार लोग रचते हैं
रचकर उसी में बसते हैं
अपने रचे में
अपनों को भी बसाते हैं
ज्यादा  सही कि अपनों को ही बसाते हैं

समझदार लोग सूंघ लेते हैं
अवसर
और कलात्मक ढ़ंग से बना देते है
अपने आप को अपरिहार्य

इस तरह
समझदार,अंततः समझदार बना रहता है

.
4 - एक तरफा प्रेम

बार-बार हमें
बताया जाता है कि
बहुत सुंदर है हमारा देश
हजारों हजार प्रेम करने वाले लोगों की
सुनाई जाती है कहानियां

नियम और फायदे गिनाते हुए
संगीनों और बूटों की चमक-धमक के साथ
कहा जाता है कि जो ‘हमारा’ है
इसलिए मान लो कि ‘तुम्हारा’ भी है ।

अब लाजमी है कि
प्रेम करो..........तुम



लेकिन ..
मैं नहीं कर सकता
नहीं ही कर सकता ....कि
मालूम है मुझे
‘एकतरफा प्रेम’ मनोरोग है ......

मनोज  पाण्डेय 

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011


कुछ कविताये जो परिकथा जनवरी  2011 में आयीं थीं 

शीर्षक -  बाबर
  
तुमने अपने बेटे से
अपने लिए
उसकी जवानी नहीं मांगी
न ही
उसे चौदह क्या,दो दिन के लिए भी
दिया वनवास
कि,निभ जाये ,तीसरी पत्नी को दिए 
"प्राण जाए पर वचन न जाए "
की कुल रीति 
न ही
बुढौती में उठने वाली
वासना की छणिक   कौंध में ;
अपने बेटे से  करवाई 
भीषण  प्रतिज्ञा  
न ही
जिंदगी के बाकी बचे दो चार दिनों न
में 'जनम-जनम का साथ निभाने' आई 
चौथी-पाचवीं ........पत्नी के बहकावे में 
अपने बेटे की आँखों में 
उसके अपने हाथों से 
गर्म सलाखें डलवाई 
मैं !!!!!!
न अशोक 
न शांतनु
न दशरथ 
और 
न ही ययाति 
मैं....
तुम्हारी तरह पिता होना 
चाहता हूँ 
बाबर 
२,    शीर्षक -खंडित देव मूर्तियाँ  
घर आये
पढ़े -लिखे रिश्तेदार ने
पहली बार
माँ का
नहीं ......
शायद
 पिता का ध्यान दिलाया था 
पड़ोस की चाची ने भी 
वापस जाते हुए रुक गयी थीं 
उसे देखकर
माँ के साथ
घर की देहरी पर
खड़ी हो काफी देर तक
इसके मंगल-अमंगल से लगायत
विधि-विधान की
उनके उध्दरणों-उदाहरणों के साथ
शास्त्रीय चर्चा की
कि
दीवार पर लगी
गणेश की मूर्ति
की नाक टूट गयी है .
विघ्ननाशक,कल्याणकारी
प्रथम पूजित देवता की मूर्ति
अब;
अमंगलकारी हो चुकी है !
घर में खंडित  मूर्तिओं का
अशुभ प्रभाव
छीक आने से लेकर
दफ्तर में अधिकारी के
आखँ तरेरने तक जुड़ चूका है
''सुख-सम्पति घर आवै  
कष्ट मिटै तन का ''
आरती गाने वाली माँ ने
घर के कोने-कोने से
खोजी गयी खंडित मूर्तियों,
फटे-पुराने चालिसाओं
बदरंग फोटुओं को 
ठिकाने लगाने की 
धार्मिक जिम्मेदारी 
मुझे दी .
इन सबकी एक गठरी
बड़ी पालीथीन में भर कर बना दी 
जिसमें कई दिनों के मुरझाये 
बासी फूल भी थे ...
शायद , अंतिम नैवेध्य की तरह 
मैं,
दफ्तर जाते हुए 
उनके लिए पीपल की छावँ
या,
छोटी-बड़ी नदी की जल-धारा खोजने लगा. 
३- शीर्षक-  गाँधी! कैसे गए थे चंपारण  ?
पहली बार
चम्पारण
किस ट्रेन से गए थे
गाँधी ?
'सत्याग्रह' पकड़ी थी,तो
गोरखपुर उतरे या
छपरा
आम्रपाली थी तो
कितनी लेट
तीसरे दर्जे के डिब्बे में
 जगह पाने के लिए
गाँधी! कितने घंटे पहले
स्टेशन पर आ गए थे
तुम ?
लाइन में कितनी देर खड़ा रहना पड़ा था ?
कस्तूरबा भी रही होंगीं
एक बेटे को गोदी उठाए
और दूसरे की अंगुली पकडे
मोटरी-गठरी भी रही होगी साथ
लाइन सीधी कराने में
आर० पी० यफ० के सिपाही ने
कितनी बार डंडे फटकारे थे ?
गालिओं की गिनती नहीं की होगी
तुमने ?
शायद
योग भी करते थे तुम
हाँ ,बताओ मूत्रयोग 
में कितनी पीड़ा हुई थी
पादते-गंधाते लोगों के
बीच!
तीसरे दर्जे के आदमी को
अपनी पेशाब रोकने में
महारत हासिल होती है ना !
टिकट होने के बाद भी
जी० आर० पी० और टी० टी० बाबू को
कितने रुपये दिए थे ?
टिन के डब्बे के साथ
कपडे के थैले का अलग
हिसाब भी तो जोड़ा
होगा टी० टी० बाबू ने
गाँधी !
तुम्हारा तीसरा दर्जा
सत्याग्रह,जननायक
सम्पूर्णक्रांति,सप्तक्रांति
सदभावना,वैशाली
और न जाने कितनी ट्रेनों
के जनरल डिब्बों  से कितना
मिलता था
कभी मिलें  तो
 बताना !!!!!



ये  मेरी पहली बार प्रकाशित होने वाली कविताये है .