कुछ कविताये जो परिकथा जनवरी 2011 में आयीं थीं
शीर्षक - बाबर
तुमने अपने बेटे से
अपने लिए
उसकी जवानी नहीं मांगी
न ही
उसे चौदह क्या,दो दिन के लिए भी
दिया वनवास
कि,निभ जाये ,तीसरी पत्नी को दिए
"प्राण जाए पर वचन न जाए "
की कुल रीति
न ही
बुढौती में उठने वाली
वासना की छणिक कौंध में ;
अपने बेटे से करवाई
भीषण प्रतिज्ञा
न ही
जिंदगी के बाकी बचे दो चार दिनों न
में 'जनम-जनम का साथ निभाने' आई
चौथी-पाचवीं ........पत्नी के बहकावे में
अपने बेटे की आँखों में
उसके अपने हाथों से
गर्म सलाखें डलवाई
मैं !!!!!!
न अशोक
न शांतनु
न दशरथ
और
न ही ययाति
मैं....
तुम्हारी तरह पिता होना
चाहता हूँ
बाबर
२, शीर्षक -खंडित देव मूर्तियाँ
घर आये
पढ़े -लिखे रिश्तेदार ने
पहली बार
माँ का
नहीं ......
शायद
पिता का ध्यान दिलाया था
पड़ोस की चाची ने भी
वापस जाते हुए रुक गयी थीं
उसे देखकर
माँ के साथ
घर की देहरी पर
खड़ी हो काफी देर तक
इसके मंगल-अमंगल से लगायत
विधि-विधान की
उनके उध्दरणों-उदाहरणों के साथ
शास्त्रीय चर्चा की
कि
दीवार पर लगी
गणेश की मूर्ति
की नाक टूट गयी है .
विघ्ननाशक,कल्याणकारी
प्रथम पूजित देवता की मूर्ति
अब;
अमंगलकारी हो चुकी है !
घर में खंडित मूर्तिओं का
अशुभ प्रभाव
छीक आने से लेकर
दफ्तर में अधिकारी के
आखँ तरेरने तक जुड़ चूका है
''सुख-सम्पति घर आवै
कष्ट मिटै तन का ''
आरती गाने वाली माँ ने
घर के कोने-कोने से
खोजी गयी खंडित मूर्तियों,
फटे-पुराने चालिसाओं
बदरंग फोटुओं को
ठिकाने लगाने की
धार्मिक जिम्मेदारी
मुझे दी .
इन सबकी एक गठरी
बड़ी पालीथीन में भर कर बना दी
जिसमें कई दिनों के मुरझाये
बासी फूल भी थे ...
शायद , अंतिम नैवेध्य की तरह
मैं,
दफ्तर जाते हुए
उनके लिए पीपल की छावँ
या,
छोटी-बड़ी नदी की जल-धारा खोजने लगा.
३- शीर्षक- गाँधी! कैसे गए थे चंपारण ?
पहली बार
चम्पारण
किस ट्रेन से गए थे
गाँधी ?
'सत्याग्रह' पकड़ी थी,तो
गोरखपुर उतरे या
छपरा
आम्रपाली थी तो
कितनी लेट
तीसरे दर्जे के डिब्बे में
जगह पाने के लिए
गाँधी! कितने घंटे पहले
स्टेशन पर आ गए थे
तुम ?
लाइन में कितनी देर खड़ा रहना पड़ा था ?
कस्तूरबा भी रही होंगीं
एक बेटे को गोदी उठाए
और दूसरे की अंगुली पकडे
मोटरी-गठरी भी रही होगी साथ
लाइन सीधी कराने में
आर० पी० यफ० के सिपाही ने
कितनी बार डंडे फटकारे थे ?
गालिओं की गिनती नहीं की होगी
तुमने ?
शायद
योग भी करते थे तुम
हाँ ,बताओ मूत्रयोग
में कितनी पीड़ा हुई थी
पादते-गंधाते लोगों के
बीच!
तीसरे दर्जे के आदमी को
अपनी पेशाब रोकने में
महारत हासिल होती है ना !
टिकट होने के बाद भी
जी० आर० पी० और टी० टी० बाबू को
कितने रुपये दिए थे ?
टिन के डब्बे के साथ
कपडे के थैले का अलग
हिसाब भी तो जोड़ा
होगा टी० टी० बाबू ने
गाँधी !
तुम्हारा तीसरा दर्जा
सत्याग्रह,जननायक
सम्पूर्णक्रांति,सप्तक्रांति
सदभावना,वैशाली
और न जाने कितनी ट्रेनों
के जनरल डिब्बों से कितना
मिलता था
कभी मिलें तो
बताना !!!!!
ये मेरी पहली बार प्रकाशित होने वाली कविताये है .
अच्छी रचनायें ............. बधाई स्वीकारें
जवाब देंहटाएंbahut behtar, shubhkamnayen
जवाब देंहटाएंबहुत शानदार कवितायेँ हैं मनोज, शुभकामनाएँ.
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