जनपथ नवंबर 2013 में प्रकाशित कविताएँ
1- चुक जाने के बाद
सब कुछ बेच- खरीद कर
चुक जाने के बाद
आना लौट कर
अपनी कविता के पास
किसी भी रस्ते से
पर दुकान से होते नहीं
पूरी की पूरी तुम्हारी होगी
बिना ख़रीदे , बिना बेचे
आना अपनी कविता के पास
अच्छर ग्यान से ही काम चलेगा
गणित न आती हो तो भी
गढ़ सको, तो गढ़ना
रच सको, तो रचना
लिख सको, तो लिखना
देख सको, तो देखना
पढ़ सको, तो पढना
पूरा का पूरा महसूस कर सकोगे
अपने आपको
सब कुछ बेच- खरीद कर
चुक जाने के बाद
खोजना अपनी कविता को
बंद आखों से काम चलेगा
अच्छर चीन्ह न पाओ तब भी
देखना, किसी की आँखों में
छूना, किसी की घुंघराली लटों में
सुनना, किसी तोतली बोली में
सूँघना, धरती से उठती गंध में
चखना, अनजानी रिश्तों के रस में
बिना ख़रीदे बिना बेचे
पाओगे
कि, कविता तुम्हारी ही है .
सब कुछ बेच- खरीद कर
चुक जाने के बाद
आना ही है, लौट कर
एक न एक ........................
दिन
कभी न कभी
कभी न कभी
2 - बेटे जैसा माना था ..........
बेटे जैसा मान कर
रखा था घर में
पूरी सोसाएटी मानती थी
यह बात !
पर
बेटे जैसे को
अपनी रोटियाँ अलग ही
सेकनी थी खुद
जल्दी में सिकी रोटियों
का साथ , अक्सर
अकेली , बासी सब्जी ही
निभाती थी .
चाय भी बामुश्किल दो बार मिलाती !
इसके लिए भी
उस बेटे जैसे को
बेटे जैसा टाइम बेटाइम
जिद कर लेने का हक़ नहीं था
बेटे जैसे को
मना कर रखा था
काम पर रखने से पहले ही
कि
नहीं करोगे दोस्ती
घर की बात बाहर चली जाती है
इस रस्ते , वैसे
बेटे के सारे दोस्त
माँ पुकारते है ,मुझे
अच्छा लगता है
और, वह भी तो
जमघट लगाये रहता है
उसकी पर्सनालिटी यारबाज जो है
डांट देने के बाद
बहुत मनाना पड़ता है बेटे को
मुझे भी उसके मान जाने तक
कुछ भी तो अच्छा नहीं लगता
माँ!!!!!!!! जो हूँ ,उसकी
बेटे जैसे के साथ
सहूलियत इस बात की है
कि काम से हटा देने की धमकी ही
खत्म कर देती है उसके गुस्से को
हिदायत साफ थी
कुत्ते को पार्क घुमाने
में टाइम का ध्यान रखने की
देर होने पर
दिल धडकता कि
फँस न जाएँ बैठे बिठाएं
और
कुत्ता भी तो कम सस्ता नहीं है
आप समझ सकते है
कि, इसके बाद भी
विश्वास करने की कोई न कोई
लकीर तो खीचनी ही पड़ती है
क्या पता
हमारे विश्वास का फायदा
उठा लेने का मौका देख
बेटे की बीमारी का बहाना ही हो
पाँच हजार रुपये कम तो होते नहीं
हम तो दूसरे को भी
बेटे जैसा ही रखेंगे !!!!!!!!
कवि ने कल ही खबर पढ़ी
परिवार ने जिसे बेटे जैसा पाला था
उसी नौकर ने खाने में जहर डाला था
3- समझदार लोग
समझदार लोग
साध लेते है
छल,छंद,औ’ दम्भ
समझदार लोग जब बोलते है ‘हम’ की भाषा तो
प्रभावी ढ़ंग से उभरता है उनका ‘मैं’
यह उनकी भाषा
‘साधने’ की कला है ।
समझदार लोग रचते हैं
रचकर उसी में बसते हैं
अपने रचे में
अपनों को भी बसाते हैं
ज्यादा सही कि अपनों को ही बसाते हैं
समझदार लोग सूंघ लेते हैं
अवसर
और कलात्मक ढ़ंग से बना देते है
अपने आप को अपरिहार्य
इस तरह
समझदार,अंततः समझदार बना रहता है
.
4 - एक तरफा प्रेम
बार-बार हमें
बताया जाता है कि
बहुत सुंदर है हमारा देश
हजारों हजार प्रेम करने वाले लोगों की
सुनाई जाती है कहानियां
नियम और फायदे गिनाते हुए
संगीनों और बूटों की चमक-धमक के साथ
कहा जाता है कि जो ‘हमारा’ है
इसलिए मान लो कि ‘तुम्हारा’ भी है ।
अब लाजमी है कि
प्रेम करो..........तुम
लेकिन ..
मैं नहीं कर सकता
नहीं ही कर सकता ....कि
मालूम है मुझे
‘एकतरफा प्रेम’ मनोरोग है ......
मनोज पाण्डेय
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